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श्रीकृष्ण सरल ने राष्ट्रीय-संत के समान लालसाविहीन जीवन जिया था

अपडेट करने की तारीख: 29 अग॰ 2023

- जगदीश शर्मा ' सहज '

 
 

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के बलिदानियों पर सर्वाधिक लेखनी चलानेवाले कवि श्रीकृष्ण सरल को ‘जीवित शहीद’ इसलिए कहा जाता है कि आजीवन उनकी आत्मा और प्राण भारत की भूमि पर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ लावा उगलते रहे । क्रांतिकारियों पर अमानवीय अत्याचारों ने उन्हें उद्वेलित कर दिया था । वह मातृभूमि के लिए समर्पित रहे । उन्होंने हुतात्माओं के बलिदान को लेखबद्ध करके समाज के सामने लाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया, यहाँ तक कि अपनी संपत्ति, पत्नी के जेवर और घर तक बेच दिया ।


सरलजी का जन्म 01 जनवरी 1919 को कस्बा अशोकनगर ( तत्कालीन जिला – गुना ) म. प्र. में हुआ था । आपके पिता पं. श्री भगवती प्रसाद बिरथरे एवं माता श्रीमती यमुनादेवी थीं । बिरथरे दंपती के घर पर एक विलक्षण बालक की किलकारी गूँजी, जिनका नाम श्रीकृष्ण रखा गया । अशोकनगर की धराधाम धन्य हो गई उस प्रतिभाशाली बालक को पाकर । माँ शारदे का विशेष अनुग्रह था उन पर । बड़ी प्रखर मेधाशक्ति के धनी थे सरलजी । शरीर सुडौल, सुगठित था पढ़ने में कुशाग्र बुद्धि थे । आपका बाल्यकाल अशोकनगर में बीता । जिस मकान में आपका बाल्यकाल बीता, वह किंचित संशोधन के साथ अभी वैसा ही है कुछ हिस्से पर नावनिर्माण हो चुका है, जिसमें सरलजी के वंश के अन्य सदस्य निवासरत हैं । आपके सुपुत्र डॉ धर्मेन्द्र सरल शर्मा भोपाल व उज्जैन में निवासरत हैं । लंदन में कार्यरत अपनी पुत्री सुश्री अपूर्वा सरल शर्मा के साथ वे विरासत में प्राप्त सरलजी की धरोहर को नई पीढ़ी से जोड़ने हेतु सतत रूप से प्रयत्नशील हैं । कुछ प्रकल्पों को मूर्तरूप दिया जा चुका है जिसके अंतर्गत एक स्वनिर्मित वेबसाइट www.shrikrishnasaral.com का संचालन किया जा रहा है ।


इसी क्रम में विगत जुलाई माह में सरलजी के अप्रवासी भारतीय प्रशंसकों एवं उनकी पौत्री के प्रयासों से फ्रांस की पार्लियामेंट में फ्रांस में भारत के दूतावास-मंत्री, कैबिनेट मिनिस्टर, सांसदों एवं 11 देशों के गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में श्रीकृष्ण सरल को मरणोपरांत ‘साहित्य-गौरव’ सम्मान से विभूषित किया गया । सरलजी के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान, न केवल अशोकनगर, प्रत्युत मध्यप्रदेश एवं पूरे भारतवर्ष के लिए गौरव का विषय हैं ।


सरलजी ने अशोकनगर में सरकारी माध्यमिक विद्यालय में बतौर अध्यापक अपनी सेवाएं दी थीं, यह 1952-55 का कालखंड रहा होगा । अशोकनगर के कुछेक वयोवृध्दजन आज भी उनकी स्मृतियों को अपने हृदयस्थल में सँजोकर रखे हुए हैं, जो उनके शिष्य रहे थे । यहाँ के पाराशर मोहल्ला निवासी श्री आशाराम पाराशर (83 वर्ष) बतलाते हैं कि "सरलजी से हमने शिक्षा ग्रहण की थी । वह हमारे चाचा स्व. रामस्वरूप पराशर के रिश्तेदार थे और माध्यमिक विद्यालय में अंग्रेजी की कक्षा लेते थे । सन् 1955 में मिडिल स्कूल में सर्वश्री गिरिजाशंकर, महावीर दुबे, गोपालकृष्ण बुधौलिया, विमल कोटिया आदि हमारे सहपाठी हुआ करते थे, जिन्होंने सरलजी से ही शिक्षा प्राप्त की थी । सरलजी का पढ़ाने का तरीका ऐसा था कि एक बार समझाने पर सारी बातें हमको स्मरण रहती थीं । उन्हें अंग्रेजी का बहुत अच्छा ज्ञान था और वे धाराप्रवाह अंग्रेजी में बातें भी करते थे । उन्होंने नागपुर यूनिवर्सिटी से एम.ए. (हिंदी) एवं देवास से एम.एड. की उपाधि प्राप्त की थी । बाजार में निकलते समय वह अपने सिर पर हेट (खाकी टोप) पहना करते थे ।"


श्री पाराशर जी आगे बतलाते हैं कि सरलजी आचरण की पवित्रता पर बल देते थे, वह अक्सर कहा करते थे कि “आप अपना स्वास्थ्य, संपत्ति, धन-वैभव सबकुछ दुबारा हासिल कर सकते हैं, लेकिन यदि आपने अपना आचरण खो दिया, तो उसे पुनः प्राप्त नहीं कर सकते ।“ सरलजी ब्राह्मण कुल में जन्मे धर्मप्रवृत्त व्यक्ति थे, वह सांझ के समय अपनी दालान में सुखासन में स्थित होकर रामायण का नित्य पारायण किया करते थे और उनके कुटुम्बी-अग्रज श्री मांगीलाल दुबे उनके साथ उसका अर्थ करते थे । लोग उनके पाठ को ध्यानपूर्वक सुनते थे । सरलजी लोगों से कम ही मिलते थे वह अपना अधिकतर समय विद्याध्ययन एवं लेखन कार्य में लगाते थे । वह सिर्फ नाम से ही सरल नहीं थे अपितु व्यवहार से भी नम्र व सरल थे । वह गुना केंट में स्कूल में हेडमास्टर रहे और अन्य स्थानों पर सेवाएं देते हुए सन् 1960के आसपास शिक्षा महाविद्यालय में प्रोफेसर होकर उज्जैन चले गए थे, जहाँ से सन् 1976 में वे सेवानिवृत्त होकर सतत रूप से लेखनकार्य में लीन रहे ।


सरलजी ने अपने जीवनपर्यंत कभी आत्मप्रशंसा को महत्व नहीं दिया । उनको अपनी प्रशंसा सुनना भी अच्छा नहीं लगता था; उनके ही शब्दों में –


नहीं महाकवि और न कवि ही, लोगों द्वारा कहलाऊं,

सरल शहीदों का चारण था, कहकर याद किया जाऊं ।


मिथ्या प्रशंसा को सरलजी आत्मोन्नति में बाधक एवं पतन का कारण मानते थे । श्रीकृष्ण सरल कृत महाकाव्य ‘सरदार भगत सिंह’ के सर्ग 1 - सिंह-जननी में उन्होंने लिखा है –


सुन प्रशंसा, आदमी कर्तव्य जाता भूल,

अनधिकृत श्लाघा, पतन के लिए पोषक मूल।


राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल ने अपने निजी व्यय से 125 पुस्तकों सहित 15 महाकाव्य, खण्डकाव्य, उपन्यास, काव्य-संकलन, हास्य-व्यंग्य संकलन एवं जीवनी आदि का प्रकाशन कराया । उन्हें अपनी पवित्र कृति "क्रांति-गंगा" लिखने में लगभग तीन दशकों का समय लगा । जीवनपर्यन्त क्रांतिकारियों पर अपनी लेखनी चलाने वाले राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल के प्रति तत्कालीन सरकारों का व्यवहार उपेक्षापूर्ण रहा । हालांकि शासन में उच्च पदों पर बैठे सत्तासीन उनकी लेखनी की ताकत को जानते थे और उनका लोहा मानते थे । तत्कालीन सांसद शंकरदयाल सिंह ने कहा था - "सरलजी के लेखन का मूल्यांकन तो इतिहास ही कर सकेगा, हम तो केवल उनकी वंदना कर सकते हैं।" पूर्व राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह के शब्दों में - "सरल साहब ने इतनी साहित्यिक ऊंचाइयां प्राप्त कर ली हैं कि अब उन्हें कोई भी अलंकरण छोटा पड़ेगा।"


सरलजी ने कर्म की सत्ता को सफल जीवन का अविभाज्य अंग माना है, वह कर्म की महत्ता बतलाते हैं


कहो नहीं करके दिखलाओ, उपदेशों से काम न होगा,

अंधकार यदि दूर भगाना, कहो नहीं तुम दीप जलाओ।


यह पंक्तियां किसी के लिए भी जीवनधन हैं । लक्ष्य पर निशाना साधने के लिए सरलजी अपने लेखन से लोगों को जाग्रत करते हैं –

लक्ष्य-प्रति उन्मुख रहो सदा,धनुष पर चढ़कर तीर की तरह ।

जियो या मरो, वीर की तरह ।


इस तरह के अनेक रत्नरूपी वाक्यांश सरलजी कीमती साहित्य में छुपे हुए हैं । क्रांतिकारियों के वीरतापूर्ण कृत्यों और उनके उत्साही चरित्रों को उन्होंने अपने जीवन में ढाल लिया था । उनके हृदय में राष्ट्रजननी के लिए असीम श्रद्धा थी । विदेशी शासन के खिलाफ क्रांति की लहरें उनके मनोमस्तिष्क को उद्वेलित किया करती थीं । वह भारत की पवित्र धरती पर अन्याय, अत्याचार, कपट, विद्वेष व हिंसा के खिलाफ शब्दों को हथियार बनाकर आजीवन लड़ते रहे । जवानी में जो कार्य सम्पन्न हो जाते हैं, वह बचपन व बुढ़ापे में नहीं किये जा सकते । सरलजी ने स्पष्ट शब्दों में भगतसिंह के मार्फ़त इसे शब्दांकित किया है -


वैसे जब होती उमर, सभी होते जवान

कुछ और बात थी उस पर चढ़ी जवानी में,

संकल्प धधकते थे उसके उर में ऐसे,

लग जाये जैसे आग सिंधु के पानी में ।


राष्ट्ररक्षा के लिए हर एक व्यक्ति को साहस के साथ अविचल होकर खड़े रहना चाहिए । वीरतापूर्ण कार्य व्यक्ति को महान बनाते हैं । सरलजी ने चंद्रशेखर आज़ाद को अच्छी तरह से समझा था, तभी तो उन्होंने आज़ाद पर अपने महाकाव्य में लिखा है -


मैंने देखा, वे क्रांति-वीर सब ही के सब,

यौवन-मद में मदमाते सिंह हठीले थे ।

थे पुष्ट वक्ष, गर्वोन्नत मस्तक, सबल बाहु,

तेजोदीप्त, बलशाली और गठीले थे ।


(श्रीकृष्ण सरल कृत महाकाव्य ‘अजेय सेनानी चंद्रशेखर आज़ाद’ | रेल की नकेल | पृष्ठ 1 )


काकोरीकाण्ड (09 अगस्त 1925 ) में जब क्रांतिकारियों ने अंग्रेजी खजाने को हथियार खरीदने के लिए लूट लिया था, जो कि स्वदेश की ही संपत्ति थी, जिसे राष्ट्रोत्थान के लिए उपयोग में लिया जाना था, सरलजी ने इसे लेखबद्ध करके राष्ट्रीय स्वतंत्रता के वीर सिपाहियों को दी गई सजा का विरोध किया । सरकारी पद पर रहते हुए भी अन्याय व दमन के खिलाफ सरलजी कभी नहीं झुके, जिसके लिए भले ही उन्हें जेल जाना पड़ा हो ।


सरलजी ने निजी प्रयासों से अपने कार्यकाल के दौरान जन्मभूमि अशोकनगर में सरकारी मिडिल स्कूल की दो मंजिला बिल्डिंग बनवाई, जो आज भी मौजूद है । लेखक ने भी इसी स्कूल से माध्यमिक शिक्षा हासिल की है । लेखक का सौभाग्य है कि वह राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल और गिरिजाकुमार माथुर की जन्मस्थली में निवास करते हैं तथा लेखन की कुछ विधाओं में समाज एवं राष्ट्रहित के संकल्प के साथ सहित्योपासना कर रहे हैं ।


राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल भारत के महान राष्ट्रीय-संत विनोबा भावे की ही तरह लालसाविहीन जीवन जीते रहे एवं समाज व राष्ट्र की उन्नति के लिए अपना सर्वस्व समर्पित करते रहे ।


 

- जगदीश शर्मा ‘ सहज ’

साहित्यसाधक ( हिन्दी कविता, गीत )

सचिव, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति इकाई अशोकनगर

प्रकाशित काव्य-संग्रह -'आस्था के मोती' (2020), 'अरुणोदय' (2022)

बीएससी एमए (इतिहास), परास्नातक कंप्यूटर ऍप्लिकेशन्स

म.प्र. तुलसी अकादमी भोपाल से प्राप्त तुलसी सम्मान 2021

लेखक परिचय - https://www.shrikrishnasaral.com//profile/jagdish-sahaj

 

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