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श्रीकृष्ण सरल के काव्य की कालजयी अभिप्रेरणाएँ

अपडेट करने की तारीख: 24 फ़र॰ 2023

- डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव

 
 

नहीं महाकवि और न कवि ही, लोगों द्वारा कहलाऊँ

सरल शहीदों का चारण था, कहकर याद किया जाऊं।

लोग कहें बंदूक कलम थी, वह सन्नद्ध सिपाही था।

शौर्य वीरता का गायक वह, वह काँटों का राही था।


. . . की अभिलाषा रखनेवाले, क्रांतिकारियों की वीर गाथाओं के अमर गायक, देशभक्ति और ओज के यशस्वी कवि श्रीकृष्ण सरल का संपूर्ण रचना संसार निरंतर गतिशील राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना से चालित है।


जब राष्ट्र के संचित सुकर्म फलीभूत होते हैं, तब उस भूमि पर ऐसी विलक्षण प्रतिभा और कालजयी सर्जक अवतार लेते हैं, जो राष्ट्र के ऋण को चुकाने, समाज के सर्द खून को गर्माने और देश के सांस्कृतिक जागरण के लिए समर्पित होते हैं, जिन्हें समाज भूल नहीं पाता है। ऐसे ही राष्ट्रभक्ति एवं भारतीय शौर्य-वीरता को सच्चे अर्थों में जीवन में उतारनेवाले सादगी एवं सरलता की प्रतिमूर्ति थे – महाकवि श्रीकृष्ण सरल।


श्रीकृष्ण सरल एक ऐसा अनुपम व्यक्तित्व थे जो कहने को तो एक शिक्षक रहे, पर उन्होंने मुख्य भूमिका इतिहासकार एवं साहित्यकार की निभाई।


ज्ञात-अज्ञात 2,000 से अधिक महान स्वतंत्रता सेनानियों, शहीदों पर शोध परक लेखन और महाकाव्यों का सृजन करनेवाले श्रीकृष्ण सरल का व्यक्तित्व एवं कृतित्व अपने समकालीन साहित्यकारों से भिन्न और श्रेष्ठ है। हम उनके काव्य का मूल्यांकन करने का प्रयास न करते हुए, उनका वंदन ही करते हैं। आधुनिक काव्य-धारा में राष्ट्रीयता मुखरित करनेवाले रचनाकारों में श्रीकृष्ण सरल ही एक ऐसे सर्जक हैं, जिन्होंने क्रांतिकारियों और देश के सांस्कृतिक निर्माता के जीवन एवं आदर्शों को अपने लेखन का एकमात्र केंद्र बिंदु बनाया है। राष्ट्र के प्रति संकल्पित क्रांतिकारी जीवन-दर्शन की धारा उनकी रचना-प्रक्रिया की मूल प्रेरणा है। क्रांतिकारियों की वंदना को उन्होंने अपने जीवन और काव्य का साध्य माना है वे कहते हैं –


क्रांति के जो देवता मेरे लिए आराध्य

काव्य साधन मात्र, उनकी वंदना है साध्य।


सरलजी बाल्यावस्था से ही क्रांतिकारियों के प्रत्यक्ष संपर्क में रहे और स्वयं भी क्रांति के भागीदार बने थे। उन्होंने क्रांतिकारियों के महान त्याग और उच्च आदर्शों को अत्यंत निकट से देखा-परखा तथा अपनी आत्मा में बसाया था। स्वतंत्रता के बाद वे निरंतर अनुभव करते रहे कि देशहित अपने जीवन का उत्सर्ग कर देनेवाले क्रांतिवीरों को देश वह सम्मान नहीं दे रहा है, जिसके वे सुपात्र हैं। उनके उच्च आदर्शों और बलिदानों की उपेक्षा हो रही है, जबकि उन्हें आनेवाली पीढ़ियों की प्रेरणा के लिए सुरक्षित रखना चाहिए।


इसी भाव से प्रेरित होकर उन्होंने शहीदों की चरित्र पूजा और बलिदानों की स्मृतियों को अमर काव्य में साकार करना अपना संकल्प बना लिया और स्वयं को अमर शहीदों का चारण घोषित कर दिया। वे कहते हैं –


पूजे न शहीद गए तो फिर

आजादी कौन बचाएगा ?

फिर कौन मौत की छाया में

जीवन के रास रचाएगा ?

वे मानते थे कि

है अमर शहीदों की पूजा

हर एक राष्ट्र की परंपरा,

उनसे है माँ की कोख धन्य

उनको पाकर है धन्य धरा।


सरलजी ने गद्य एवं पद्य में समान लेखन किया। उनकी काव्य रचनाएंँ जितनी महत्वपूर्ण हैं, उतना ही महत्वपूर्ण है उनके द्वारा पाँच भागों में लिखित ‘क्रांतिकारी कोश’, जो भारतीय क्रांतिकारी इतिहास का दुर्लभ ग्रंथ है, जीवंत दस्तावेज है। इसमें उन्होंने देश भर में घूम-घूमकर लगभग 2,000 गुमनाम क्रांतिकारियों के संस्मरण संजोए हैं। क्रांतिकारियों के एनसाइक्लोपीडिया के रूप में विख्यात यह महाग्रंथ सरलजी की तीन दशकों की शोध-यात्रा के फलस्वरूप प्रकाशित हुआ था जिसे लोकप्रियता एवं प्रामाणिकता के आधार पर अंग्रेजी भाषा में पांच खंडों में अनूदित कर वर्ष 1999 में ‘इंडियन रिवोल्यूशनरीज़’ शीर्षक से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध कराया जा चुका है।


नेताजी सुभाषचंद्र बोस के प्रति उनके मन में अत्यधिक स्नेह, श्रद्धा और समर्पण देखने को मिलता है। उन्होंने सुभाषचंद्र बोस पर कुल 18 ग्रंथों की रचना की। इसका मुख्य कारण यह है कि नेताजी के चारित्रिक गुण और वीरतापूर्ण कार्य उन्हें सदा आकर्षित करते रहे। उन्हें सुभाषचंद्र बोस के कालजयी व्यक्तित्व में राम, कृष्ण, अर्जुन, महावीर, बुद्ध, महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और गुरु गोविंदसिंह की प्रतिच्छाया प्रतिभासित होती दिखाई देती है। वहीं दूसरी ओर सुभाष के मूल्यांकन का अभाव उन्हें निरंतर अनुभव होता रहा,खलता रहा और इसीलिए उन्होंने उन्हें अपनी रचनाओं का चरित्र नायक बनाते हुए उन पर समग्र और प्रामाणिक लेखन का संकल्प लिया था।


सरलजी ने जिन भी क्रांतिकारियों पर अपनी लेखनी चलाई है, उनसे संबंधित घटनाएंँ एवं चिंतन मात्र ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर ग्रहण नहीं किया है, वरन् उन स्थानों, घटनाओं और तथ्यों का शोध परक अध्ययन करके आत्मसात किया है, अपनी आत्मा में बसाया है, फिर प्रामाणिक लेखन और प्रकाशन का अति महत्त्वपूर्ण और दुष्कर कार्य किया है। परंपरागत इतिहास ग्रंथों के अंधेरे में छिपे सत्य की तलाश के लिए सरलजी ने 12 देशों की यात्राएंँ की तथा व्यापक व गहरे सत्य को पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत किया।


अपने इस महत् संकल्प को पूर्ण करने के लिए उन्होंने अपना सब कुछ क्रांति साहित्य देवता की पूजा में अर्पित कर दिया- बहुत ही प्यार पूर्वक सहेजी गई अपनी प्रिय वस्तुओं को बेचा, शहीदों की चित्रावलियों को बेचा, पत्नी के गहने, बच्चों के कपड़े तक बेचे, जगह-जगह कविता-पाठ किया और यात्राओं के लिए एवं पुस्तक प्रकाशन के लिए आर्थिक साधन जुटाए।


उन्हें सरकार से आजीवन कोई सहायता नहीं मिली और न किसी प्रकाशक का ही सहयोग मिला। घटिया और लोकप्रिय साहित्य के लेखकों को सरलता से प्रकाशक मिल जाते हैं, परंतु युग निर्माण का कार्य करनेवाले ठोस और क्रांति-साहित्य को प्रकाशक मिलना सदैव ही कठिन रहा है।


सुप्रसिद्ध साहित्यकार बनारसीदास चतुर्वेदी ने कहा है, "भारतीय शहीदों का समुचित श्राद्ध केवल श्रीकृष्ण सरल ने किया है।" महान क्रांतिकारी पंडित परमानंद कहते हैं कि "श्रीकृष्ण सरल एक जीवित शहीद थे। उनकी साहित्य-साधना तपस्या कोटि की है।"


आजाद हिंद फौज के कर्नल जी. एस. ढिल्लन ने कहा है कि "सरलजी का लेखन ऐतिहासिक दस्तावेज से कम नहीं है। वह नेताजी सुभाष और आजाद हिन्द फौज का स्थायी स्मारक सिद्ध होगा।"


सरलजी ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि मनुष्य की संकल्प शक्ति दृढ़ हो, तो कड़ी परीक्षा के बाद सब कुछ अनुकूल हो जाता है। उनके चरित्र की विशिष्टताओं को आज की युवा पीढ़ी में प्रसारित करना हम सबका पावन दायित्व है।


मेरी दृष्टि में श्रीकृष्ण सरल का रचना संसार विपरीतताओं में से अनुकूलताओं की रचना का इतिहास है।


सरलजी ने अपने लेखन, प्रकाशन की कीमत चुकाने में भले ही सब कुछ बेच दिया पर उनका ईमान और रचना-धर्म कभी नहीं बिका, न झुका, न रुका – जिसकी कीमत भी अनेक कष्टों के रूप में वे सहर्ष चुकाते रहे। उनका रचनाकार अप्रतिहत, जीवंत, जागृत और निरंतर प्रबुद्ध रहा है। उन्होंने बहुत ही आत्मगौरव से लिखा है –


मुझे बुझाकर देखे कोई, बुझनेवाला दीप नहीं मैं

जो तट पर मिल जाया करती, ऐसी सस्ती सीप नहीं मैं।

शब्द-शब्द मेरा म़ोती है, गहन अर्थ ही सच्चा धन है।

मुझ में ज्योति और जीवन है।


श्रीकृष्ण सरल का उपनाम ‘सरल’ था, वे अपने स्वभाव और जीवन में भी सरल थे, लेकिन अपनी रचनाओं में वे दहकते हुए अंगारे से कम नहीं थे। एक गीत में वे कहते हैं –


अपने गीतों से गंध बिखेरूँ मैं कैसे

मैं फूल नहीं काँटे-अनियारे लिखता हूँ।

मैं लिखता हूँ मँझधार, भँवर, तूफान प्रबल

मैं नहीं कभी निश्चेष्ट किनारे लिखता हूँ।


मैं गायक हूँ उन गर्म लहूवालों का ही

जो भड़क उठें, ऐसे अंगारे लिखता हूँ।


श्रीकृष्ण सरल तथाकथित समालोचकों एवं पत्रकारों की दृष्टि में महान साहित्यकारों की श्रेणी में नहीं आ सके हैं। निश्चित ही उनमें वे विशिष्ट गुण नहीं थे जो मीडिया, सरकार या समालोचकों को आकर्षित कर पाते हैं। हम जैसे-जैसे सरलजी की साहित्य-गंगा में अवगाहन करते हैं, यह भाव प्रबल होता जाता है कि सरलजी जैसे दु:साध्य कार्य महान व्यक्ति नहीं, अपितु राष्ट्र-प्रेम का पान करनेवाले दीवाने ही कर पाते हैं।


देशभक्तों और भारतमाता के सपूतों के प्रति श्रद्धावनत सरलजी से बड़ा राष्ट्र-प्रेमी और नहीं हो सकता है? मुझे तो सरलजी की काव्य-यात्रा में एक फक्कड़ता, समर्पण और देश के लिए कुछ भी कर गुजरने का जुनून अनुभव होता है। उनका देशप्रेम दीवानगी की पराकाष्ठा तक पहुँच गया था। उनकी कविता पढ़ते हुए हम कबीर का फक्कड़पन और परोपकारी निर्भीकता, मीरा जैसा समर्पित दीवानापन निरंतर अनुभव करते हैं। उनकी कविता के भावन के लिए बुद्धि से अधिक हृदय की आवश्यकता होती है। आज के संवेदनहीन होते हृदयों के लिए वह सहृदयता जगाने का सशक्त माध्यम है।


वे भाव और भावनाओं के धनी एक तपस्वी साधक थे, जो प्रशंसा-भाव से विरत रहे, किंतु कर्तव्य निष्ठा के निर्वहन में सतत निरत रहे हैं, निरंतर संघर्षशील रहे हैं। उनका कवि मन अपने सामाजिक दायित्व बोध के प्रति निरंतर सजग रहा है। इसके प्रमाण एकत्र करने हमें किसी समीक्षक, आलोचक का लेखन खोजने की आवश्यकता नहीं, राष्ट्रीयता के मूल्यों से अनुप्राणित सरलजी की समस्त रचनाएंँ इसका प्रमाण हैं।


वे युवाओं को सतत् नई राहों के अन्वेषण की प्रेरणा देते हुए कहते हैं –


प्रेरक बने अतीत तुम्हारा, नए क्षितिज की ओर चरण हों,

नए लक्ष्य की ओर तुम्हारे, उन्मुख जीवन और मरण हों।

रखे बाँधकर जो जीवन को, ऐसे हर बंधन को तोड़ो

छोड़ो लीक पुरानी छोड़ो।

वे मानते हैं –

वीरता जीवन का भूषण

वीर - भोग्या है वसुंधरा,

भीरुता जीवन का दूषण

भीरु, जीवित भी मरा-मरा।

वीर बन उठो सदा ऊँचे, न नीचे बहो नीर की तरह।

जियो या मरो, वीर की तरह।


राष्ट्र के प्रति समर्पित सरलजी का मानना है कि –


केवल गति ही जीवन, विश्रान्ति पतन है,

तुम ठहरे, तो समझो ठहरा जीवन है।

जब चलने का व्रत लिया, ठहरना कैसा?

अपने हित सुख की खोज, बड़ी छलना है।

मत ठहरो, तुमको चलना ही चलना है।


वे सदा राष्ट्र-हित को सर्वोपरि मानते हुए युवाओं को सन्नद्ध रहने का आह्वान करते हैं –


देश के भूगोल पर जब भेड़िए ललचा रहे हों,

देश के इतिहास को जब देशद्रोही खा रहे हों।

देश का कल्याण गहरी सिसकियां जब भर रहा हो,

देश के निर्माण को जब ध्वंस डटकर चर रहा हो।


आग-यौवन के धनी! तुम खिड़कियां शीशे न तोड़ो,

भेड़ियों के दांँत तोड़ो, गरदनें उनकी मरोड़ो।

जो विरासत में मिला, वह खून तुमसे कह रहा है –

सिंह की खेती, किसी भी स्यार को खाने न देना,

देश की स्वाधीनता पर आँच तुम आने न देना।


श्रीकृष्ण सरल की लेखनी में प्रवाहित भावधारा दृश्यों को साकार कर देती है, बिंब-योजना को अनुपम बना देती है। देखिए भगतसिंह, सुखदेव और राजगुरु की फांँसी का लोमहर्षक दृश्य कैसे साकार हो उठा है – मैं जब इन पंक्तियों को पढ़ती हूँ, तन-मन रोमांचित हो जाता है, और बार-बार पढ़े जाने पर भी रोमांच कभी कम नहीं होता –


फाँसी की कोठरी बनी अब इन्हें रंगशाला है,

झूम-झूम सहगान हो रहा, मन क्या मतवाला है।

झन-झन-झन बज रहीं बेड़ियाँ, ताल दे रहीं स्वर में,

झूम रहे सुखदेव, राजगुरु भी हैं, आज लहर में।


खूब उछाला एक-दूसरे पर तीनों ने पानी,

होली का हुड़दंग बन गई उनकी मस्त जवानी।

गले लगाया एक-दूसरे को बाँहों में कस कर,

भावों के सब बाँध तोड़कर भेंटे वीर परस्पर।


श्रीकृष्ण सरल की समर्थ लेखनी ने जिस भी विषय का स्पर्श किया है, उसे जीवंत कर दिया है। उन्होंने बाल साहित्य लिखा, हास्य कविताएं लिखीं और जीवन के उत्तरार्ध में आपने भारतीय अध्यात्म चिंतन से अनुप्राणित 5 महाकाव्यों का सृजन किया – विवेक-श्री (स्वामी विवेकानंद), तुलसी-मानस, सरल-रामायण, सरल-सीतायन और महाबली (हनुमानजी)।


श्रीकृष्ण सरल के 125 पुस्तकों के सृजन-संसार में से अधिकांश कृतियों का कई दशकों से संपादन कार्य करते आ रहे उनके पुत्र डॉ. धर्मेंद्र सरल शर्मा (पूर्व वाणिज्यिक कर अधिकारी, मध्यप्रदेश शासन) से मुझे यह ज्ञात हुआ कि अमर शहीदों के चारण की भूमिका का बखूबी निर्वाह करते हुए वर्ष 2000 में अपनी मृत्यु से एक सप्ताह पूर्व सरलजी ने सुभाषचन्द्र बोस के जीवन पर आधारित उपन्यास ‘अक्षर-अक्षर इतिहास’ पूर्ण किया था। सरलजी के जीवन के अंतिम कई महीनों तक अपने पिता की सतत सेवा में लीन रहे धर्मेंद्र जी ने उन्हें आखिरी एक माह में लेखन की दृष्टि से सर्वथा प्रतिकूल स्वास्थ्य होते हुए भी यह पुस्तक रचते हुए देखा था। सरलजी की इस अंतिम कृति को श्री धर्मेन्द्र सरल ने स्वयं संपादित कर प्रभात प्रकाशन, नई दिल्ली से 2003 में ‘इतिहास-पुरुष सुभाष’ शीर्षक से प्रकाशित करवाया था।


हम कह सकते हैं कि श्री सरल ने देश के नौजवानों में जोश, उत्साह एवं देशभक्ति का भाव फूंकने के जितने व्यक्तिगत प्रयास किए, उतने कार्य कई संस्थाएंँ मिलकर भी नहीं कर सकी हैं। ऐसे क्रान्तिनिष्ठ, राष्ट्र-आराधक श्रीकृष्ण सरल द्वारा रचित क्रांतिकारी इतिहास की अनूठी बेजोड़ कृतियांँ एक देशभक्त की राष्ट्र-अर्चना के रूप में हमारे सामने उपस्थित होती हैं।


मैं आज के रचनाकारों का आह्वान करती हूंँ कि वे सरलजी से प्रेरणा लेते हुए, अपने में सामर्थ्य कौशल, निर्भीकता, वैयक्तिक निर्लिप्तता और संकल्प शक्ति को विकसित करें, जिससे राष्ट्र और समाज हितकारक साहित्य का पल्लवन और विकास हो सके।


मुझे विश्वास है कि हमारे प्रयासों से देश की नई पीढ़ी तक श्रीकृष्ण सरल के व्यक्तित्व की सुगंध का झोंका अवश्य ही पहुंँचेगा और राष्ट्र-चेतना, प्रेम और गौरव का भाव स्पंदित करेगा। स्वतंत्रता प्राप्ति के इस अमृतकाल में, देश के सांस्कृतिक पुनरुत्थान के संकल्प-काल में सरलजी के काव्य का अधिकतम प्रसार साहित्यकारों, साहित्यिक संस्थाओं, देशभक्त संस्थाओं और व्यक्तियों के साथ ही सरकारों का भी दायित्व बने – यही मंगल कामना है।

 

डॉ. स्नेहलता श्रीवास्तव

वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद, इंदौर

अध्यक्ष, हिंदी साहित्य भारती मध्यप्रदेश

मानद आचार्य

साहित्य अध्यात्म और दर्शन पीठ डा बी.आर.अंबेडकर विश्वविद्यालय महू

शताधिक शोधपत्र तथा आलेख का राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका में प्रकाशन

म.प्र. शासन उच्च शिक्षा विभाग का सर्वोच्च शिक्षक पुरस्कार

लेखिका परिचय - https://www.shrikrishnasaral.com//profile/snehlata

 

विशेष सूचना –

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Abhishek S
Abhishek S
Feb 11, 2023

श्रीकृष्ण सरल पर केंद्रित इस आलेख में अनेक तथ्य स्पष्टवादिता के साथ प्रस्तुत किए गए हैं। साथ ही नई पीढ़ी को क्रान्ति-साहित्य के पठन एवं लेखन की ओर उन्मुख करने की प्रेरणा प्रदान की गई है।


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