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राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल : साहित्य एवं लोकमानस की शुभकामनाएं ही उनकी धरोहर रही है

डॉ. लता अग्रवाल ' तुलजा '

 
 

राष्ट्र के स्वतंत्रता आंदोलनों में साहित्य का योगदान सदैव सर्वोपरि रहा है, भले ही ऐसे साहित्यकार उंगलियों पर गिने जाने योग्य रहे हों | इतिहास गवाह है ‘जब-जब राजनीति लड़खड़ाई, साहित्य ने उसे सम्हाला’ फिर आज तो सर्वत्र कदम लड़खड़ा रहे हैं, ऐसे में साहित्य का महत्व और भी बढ़ जाता है | साहित्य और साहित्यकार जो राष्ट्र को समर्पित हो, ऐसे ही संदर्भ की जब बात निकलती है तो बस एक नाम मानस पटल पर आता है, वह है - ‘स्व. श्रीकृष्ण सरल’ !


पिछले दिनों भोपाल में एक साहित्य-समारोह में उनके पुत्र डॉ. धर्मेन्द्र सरल शर्मा से भेंट हुई | उनसे हुई चर्चा के दौरान सरलजी के जीवन से जुड़े कई अनछुए पहलुओं के बारे में जानने को मिला | एक पंक्ति है जो मुझे बहुत प्रभावित करती है और सरलजी पर शब्दश: सार्थक भी बैठती है, उसे यहाँ उल्लेखित करना चाहूंगी –

कुछ लोग हैं जो वक्त के साँचे में ढल गए,

कुछ लोग हैं जो वक्त के साँचे बदल गए |


आजादी के दौरान हुए आंदोलनों को सरलजी ने न केवल करीब से देखा बल्कि उसकी विभीषिका को सहा भी है | शहीदों के प्रति उनके मन में जो श्रध्दा है, भावना है, उसे उन्होंने शब्द-सुमनांजलि स्वरूप अपने 15 महाकाव्यों सहित 125 पुस्तकों में पिरोकर अनोखा कीर्तिमान बनाया | अपनी कलम की शक्ति के माध्यम से उन्होंने आनेवाली पीढ़ी के लिए शहीदों के त्याग और बलिदान को संजोया तो महान क्रांतिकारी पं. परमानन्द ने सरलजी को ‘जीवित शहीद’ की उपाधि दी !


उनके सुपुत्र से जब इस सम्बन्ध में विस्तृत चर्चा हुई, तो जाना कि सरलजी का यह साहित्य जो आज अमूल्य धरोहर के रूप में संजोया जा रहा है, इस साहित्य के पीछे उनका कितना कठोर श्रम रहा है तथा उनकी यह साहित्य यात्रा किन-किन मुश्किल पड़ावों से होकर गुजरी है | यह जाना तो लगा कि पता न था समाज में ऐसे विरल व्यक्तित्व भी हैं | शहीदों की शहादत को शब्दों के जरिये युगों-युगों तक अमर कर उन्हें पुनः जीवित कर दिया, भले ही इस साधना हेतु उन्हें स्वयं अभावों की चादर ओढ़नी पड़ी | इससे बड़ा उदाहरण एक जीवित शहीद का भला क्या हो सकता है; सरलजी के आत्मज के शब्दों में -


“स्वावलंबन और स्वाभिमान सरलजी के जीवन के महत्वपूर्ण नारे थे | जीवन में कभी किसी के समक्ष हाथ फैलाना उन्हें कभी गवारा न हुआ | कई बार ऐसे अवसर आये जब सामने आवश्यक आवश्यकता मुंह बाये खड़ी थी, मगर व्यवस्था के आसार न थे | पिताजी ने उन आवश्यकताओं को नजरंदाज कर दिया | उनके जीवन का एक ही लक्ष्य था शहीदों के प्रति समर्पण |”


सरलजी कहते थे -

जो हैं शहीद, सम्मान देश का होते वे,

उत्प्रेरक होती उनसे कई पीढ़ियॉं हैं,

उनकी यादें, साधारण यादें नहीं कभी

यश-गौरव की मंज़िल के लिए सीढ़ियाँ हैं।


उत्सुकतावश मुझे यह ज्ञात हुआ कि, किस तरह इन ग्रंथों को रचने की पृष्ठभूमि तैयार हुई | शहीद भगतसिंह की माता ‘श्रीमती विद्यावती देवी’ जो अपने पुत्र को फाँसी से पहले एक नजर देख नहीं पाईं, उनकी इच्छा थी कि उनके बेटे पर कोई ग्रन्थ रचा जाए, जिस बहाने वे बेटे की स्मृतियों को संजोना चाहती थीं | यह वचन उन्होंने सरलजी से लिया | यथा नाम तथा स्वभाव, सरलजी ने वचन तो दे दिया मगर व्यवस्था का अकाल था | समय रहते उन्होंने रचनायें रच तो लीं मगर प्रकाशकों ने उन्हें निराश किया | सरलजी मुस्कुराकर कहते थे, “प्रकाशकों ने पुस्तकें बेचकर जायदाद बनाई है, मैंने जायदाद बेचकर पुस्तकें बनाई हैं |” ऐसे में उनका संबल बनीं उनकी पत्नी जिन्होंने अपने आभूषण उनके समक्ष रखे तो बच्चों ने अपने ऊनी कपड़े बेचकर प्रकाशन की व्यवस्था की | अर्थात गर्म खून पर लिखने हेतु बच्चों के गर्म कपड़े तक बिक गये | यह जानकर मुझे आश्चर्यमिश्रित दु:ख हुआ कि किस तरह सरलजी पुस्तकें प्रकाशित होने पर उन्हें हाथठेले पर रखकर उन्हें बेचने के लिए जाते थे | इस तरह पुस्तकों की जब 5 लाख प्रतियां बिक चुकीं, तो वह राशि भी सरलजी ने शहीदों के परिवार को समर्पित कर दी | ऐसे कलम के सिपाही को यदि ‘दधीचि’ की संज्ञा दी जाय, तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |


बचपन में राजगुरु के साथ वंदे मातरम के नारे लगाते हुए अंग्रेजों द्वारा सरलजी को जो चोट पहुंचाई गई, उसके घाव उन्होंने जीवन भर सम्हालकर रखे | जिसे वे अपना ‘पदक’ मानते थे | सरलजी ने सन्देश स्वरूप अपने बच्चों को यह पंक्तियाँ सौंपीं –


जीने को तो पशु भी जीते, अपना पेट भरा करते हैं

कुछ दिन इस दुनिया में रहकर, वे अंततः मरा करते हैं,

ऐसे जीवन और मरण को, होता यह संसार नहीं है

जिसे देश से प्यार नहीं है, जीने का अधिकार नहीं है |


शायद उनकी इसी श्रध्दा ने क्रांतिकारी लेखक पं. बनारसीदास चतुर्वेदी से कहलवा दिया कि “भारतीय शहीदों का समुचित श्राद्ध यदि किसी ने किया है, तो वह श्रीकृष्ण सरल ने किया है”, जी हाँ ! अव्यवस्थाओं के बीच अपनी जरूरतों को परे रख 15 महाकाव्यों सहित 125 पुस्तकों का सृजन आसान काम नहीं | सरलजी इसे महज अपना नैतिक दायित्व मानकर शहीदों के परिप्रेक्ष्य में लिखते थे –


यह सच है, दाग गुलामी के उनने लोहू से धोए हैं,

हम लोग बीज बोते, उनने धरती में मस्तक बोए हैं |


ऐसे कई अनुभव मेरा सुनकर रोम रोम सिहर गया और देश के लिए समर्पण का मोल समझ में आया | कर्म के प्रति निष्ठा, वचनबद्धता क्या होती है, कैसे निभाई जाती है, यह भी जाना | दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन्होंने राष्ट्र प्रेम की ऐसी अनूठी मिसाल पेश की, दो बार अपने आक्रोश भरे लेखन के कारण जेल भी गये, उन्हीं सरलजी को शासन से आजीवन उपेक्षा मिलती रही | यहाँ तक कि सितंबर 2000 में उनके अंतिम संस्कार में भी शासन की ओर से कोई प्रतिनिधि सम्मिलित नहीं हुआ | आज सरलजी के नाम पर 50 हजार रुपए का पुरस्कार हिंदी कविता के क्षेत्र मध्यप्रदेश सरकार द्वारा प्रादेशिक स्तर पर दिया जाता है | 75 वर्षों की कृतघ्नता व शहीदों की उपेक्षा के दाग धोने का नैतिक दायित्व अब भारतवासियों का है। सरलजी ने युवा-पीढ़ी को संबोधित करते हुए लिखा है –


अगर तुम ठान लो, तारे गगन के तोड़ सकते हो

अगर तुम ठान लो, तूफान का पथ मोड़ सकते हो,

अगर तुम ठान लो, तो विश्व के इतिहास में अपने

सुयश का एक नव-अध्याय भी तुम जोड़ सकते हो।


जिस आजादी का सुख हम भोग रहे हैं, हम नहीं जानते कि इस आजादी के लिए कितने देशभक्तों ने अपने जीवन की होली खेली है | और एक हम हैं कि आजादी में मदहोश हो उच्छ्रंखलता की हद पार कर रहे हैं | हमें इस आजादी का सम्मान करना चाहिए तभी हम विशुद्ध भारतीय कहलाने के हकदार होंगे | आओ, आज हम सरलजी की स्मृति को उन्हीं के शब्दों में श्रद्धा-सुमन अर्पित करते हैं –


अपने प्राणों से राष्ट्र बड़ा होता है,

हम मिटते हैं तब राष्ट्र खड़ा होता है।


 

डॉ . लता अग्रवाल 'तुलजा'

वरिष्ठ साहित्यकार एवं शिक्षाविद,भोपाल

एम ए अर्थशास्त्र, एम ए हिन्दी, एम एड, पीएचडी हिन्दी

महाविद्यालय में प्राचार्य, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर सक्रियता

अनेक एकल पुस्तकें, साँझा संग्रह, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित

लेखिका परिचय - https://www.shrikrishnasaral.com//profile/lata-tulja

 

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2 comentarios

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Abhishek S
Abhishek S
07 oct 2022

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अगर तुम ठान लो, तारे गगन के तोड़ सकते हो

अगर तुम ठान लो, तूफान का पथ मोड़ सकते हो,

अगर तुम ठान लो, तो विश्व के इतिहास में अपने

सुयश का एक नव-अध्याय भी तुम जोड़ सकते हो।

- राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल


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सरलजी की इन पंक्तियों के द्वारा लेखिका (आदरणीया डॉ लता अग्रवाल 'तुलजा' ) ने युवाओं के परिप्रेक्ष्य में जो निम्नलिखित संदेश दिया है, वह प्रेरणास्पद है।


"... जिस आजादी का सुख हम भोग रहे हैं, हम नहीं जानते कि इस आजादी के लिए कितने देशभक्तों ने अपने जीवन की होली खेली है | हमें इस आजादी का सम्मान करना चाहिए तभी हम विशुद्ध भारतीय कहलाने के हकदार होंगे | "

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सादर

- अभिषेक सरल…

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Apurva SARAL
Apurva SARAL
02 oct 2022

डॉ .लता अग्रवाल जी का लेख पढ़ा, सरलजी के व्यक्तित्व और संघर्ष पर आधारित यह लेख हृदय को छू जाता है 🙏

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